बिहार बोर्ड · मैट्रिक · हिंदी में मेंटरशिप

बिहार बोर्ड मैट्रिक के लिए एक पर्सनल मेंटर।

मैट्रिक का साल बिहार में सिर्फ़ एक परीक्षा नहीं होता — आगे का पूरा रास्ता यहीं से तय होता है। और सबसे ज़्यादा नुक़सान उन बच्चों का होता है जो पढ़ सकते थे, पर रोज़ बैठ नहीं पाए।

पूरी मेंटरिंग हिंदी में
रोज़ का छोटा टारगेट
हर 2–3 दिन में बात
पैरेंट्स को रिपोर्ट

यह प्रोग्राम क्या है

बिहार बोर्ड के बच्चों के लिए यह कैसे काम करता है

यह ट्यूशन नहीं है और कोचिंग बैच भी नहीं। मेंटर चैप्टर नहीं पढ़ाता — मेंटर यह पक्का करता है कि बच्चा रोज़ पढ़े, सही क्रम में पढ़े, और अकेले में हार न माने।

बिहार में मैट्रिक की तैयारी अक्सर आख़िरी तीन महीनों में सिमट जाती है। दिक्कत यह है कि तब तक बैकलॉग इतना बड़ा हो चुका होता है कि बच्चा शुरू करने से पहले ही घबरा जाता है। रोज़ का छोटा टारगेट इसी को टूटने से बचाता है — क्योंकि दो पन्ने रोज़, तीस पन्ने एक रात से हमेशा बड़े होते हैं।

सब कुछ फ़ोन और WhatsApp पर होता है। पटना, मुज़फ़्फ़रपुर, गया, भागलपुर, दरभंगा या किसी भी गाँव से — बच्चा वहीं से जुड़ सकता है जहाँ वह है।

एक नज़र में

ज़रूरी बातें

बोर्ड
बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB), पटना
परीक्षा
मैट्रिक — आमतौर पर फ़रवरी में
मेंटरिंग की भाषा
हिंदी (बच्चा चाहे तो अंग्रेज़ी)
कहाँ से जुड़ सकते हैं
पूरे बिहार से — फ़ोन और WhatsApp पर
क्या यह कोचिंग है
नहीं — यह आपकी मौजूदा कोचिंग की जगह नहीं लेता

विषय

किस विषय में क्या दिक्कत आती है

मेंटर पढ़ाता नहीं है — पर प्लान इस बात पर बनता है कि हर विषय किस तरह की मेहनत माँगता है।

गणित

रोज़ थोड़ा अभ्यास ही यहाँ काम आता है। हफ़्ते में एक दिन तीन घंटे बैठने से नंबर नहीं बढ़ते।

विज्ञान

भौतिकी के न्यूमेरिकल और रसायन के समीकरण अलग तरह की प्रैक्टिस माँगते हैं — प्लान में दोनों अलग-अलग शेड्यूल होते हैं।

सामाजिक विज्ञान

सबसे ज़्यादा टाला जाने वाला विषय, और सबसे ज़्यादा नंबर देने वाला भी। इसे छोटे-छोटे दोहरावों में बाँटा जाता है।

हिंदी

बिना तैयारी छोड़ देने की सबसे आम ग़लती। थोड़ी सी नियमित लेखन-प्रैक्टिस यहाँ तेज़ी से नंबर बढ़ाती है।

अंग्रेज़ी

डर की वजह से अक्सर आख़िर तक छुआ नहीं जाता। प्लान इसे रोज़ के छोटे हिस्सों में तोड़कर शुरू कराता है।

साल का नक़्शा

परीक्षा की तारीख़ से पीछे की ओर बनी योजना

यह हर बच्चे का प्लान नहीं है — हर बच्चे का प्लान उसकी अपनी स्थिति पर बनता है। यह सिर्फ़ वह ढाँचा है जिसके भीतर वह बनता है।

  1. अगस्त – सितम्बर

    पूरा सिलेबस लिखकर हर चैप्टर पर निशान — मज़बूत, कच्चा, या बिल्कुल नहीं पढ़ा। कच्चे चैप्टर पहले शेड्यूल होते हैं।

  2. अक्टूबर – नवम्बर

    रोज़ दो-तीन छोटे टारगेट, और जो छूटा वह उसी हफ़्ते पकड़ा जाता है।

  3. दिसम्बर

    बैकलॉग ख़त्म करने का महीना। यही तय करता है कि जनवरी रिवीज़न में जाएगा या घबराहट में।

  4. जनवरी

    पहला पूरा रिवीज़न और पिछले सालों के पेपर। जो कमज़ोर दिखे, प्लान उसी हफ़्ते बदलता है।

  5. फ़रवरी

    सिर्फ़ दोहराव और आत्मविश्वास। इस महीने कुछ नया शुरू नहीं किया जाता।

आपके सवाल

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या पूरी बात हिंदी में होगी?

हाँ। बिहार बोर्ड के बच्चों की मेंटरिंग हिंदी में ही होती है — रोज़ के टारगेट भी और कॉल भी।

बच्चा कोचिंग भी जाता है, फिर इसकी क्या ज़रूरत?

कोचिंग पढ़ाती है। यह प्रोग्राम यह देखता है कि पढ़ाया हुआ घर आकर दोहराया गया या नहीं। अगर बच्चा कोचिंग रोज़ जाता है और घर पर किताब नहीं खोलता, तो असली कमी वहीं है — और वही यह भरता है।

फ़ीस कितनी है?

फ़ीस बच्चे की ज़रूरत और मेंटरिंग की अवधि पर निर्भर करती है, इसलिए यह मुफ़्त काउंसलिंग कॉल पर बताई जाती है। उसी कॉल पर हम यह भी ईमानदारी से बताते हैं कि आपके बच्चे के लिए यह प्रोग्राम सही है या नहीं।

क्या इंटरनेट या लैपटॉप चाहिए?

नहीं। एक साधारण फ़ोन जिस पर कॉल आती हो और WhatsApp चलता हो — इतना काफ़ी है। न वीडियो कॉल ज़रूरी है, न तेज़ इंटरनेट।

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बताइए कि बच्चा कहाँ अटक रहा है। हम ईमानदारी से बताएँगे कि मेंटरशिप सही जवाब है या नहीं — और अगर नहीं है, तो वह भी कह देंगे।

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