यूपी बोर्ड · हाई स्कूल · हिंदी में मेंटरशिप

यूपी बोर्ड हाई स्कूल के लिए एक पर्सनल मेंटर।

अगर आपका बच्चा जानता है कि पढ़ना चाहिए, कहता भी है कि आज से पढ़ेगा, और फिर शाम ऐसे ही निकल जाती है — तो कमी एक और क्लास की नहीं है। कमी यह है कि उसी दिन कोई पूछने वाला नहीं होता कि आज क्या हुआ।

पूरी मेंटरिंग हिंदी में
रोज़ का छोटा टारगेट
हर 2–3 दिन में बात
पैरेंट्स को रिपोर्ट

यह प्रोग्राम क्या है

यूपी बोर्ड के बच्चों के लिए यह कैसे काम करता है

My Mentor एक वन-टु-वन मेंटरशिप प्रोग्राम है, ट्यूशन या कोचिंग नहीं। मेंटर चैप्टर नहीं पढ़ाता। मेंटर यह पक्का करता है कि बच्चा रोज़ पढ़े, सही क्रम में पढ़े, और बीच में हार न माने।

यूपी बोर्ड के ज़्यादातर बच्चों के साथ दिक्कत समझ की नहीं होती — प्लानिंग और लगातार बने रहने की होती है। सिलेबस बड़ा है, स्कूल अक्सर देर से पूरा करता है, और जनवरी आते-आते बैकलॉग इतना हो जाता है कि बच्चा शुरू ही नहीं कर पाता। यही वह जगह है जहाँ रोज़ की छोटी ट्रैकिंग सबसे ज़्यादा काम करती है।

पूरी मेंटरिंग फ़ोन और WhatsApp पर होती है, इसलिए लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज, मेरठ या किसी छोटे कस्बे — कहीं से भी बच्चा जुड़ सकता है। कहीं आना-जाना नहीं है।

एक नज़र में

ज़रूरी बातें

बोर्ड
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (UPMSP), प्रयागराज
परीक्षा
हाई स्कूल — आमतौर पर फ़रवरी–मार्च में
मेंटरिंग की भाषा
हिंदी (बच्चा चाहे तो अंग्रेज़ी)
कहाँ से जुड़ सकते हैं
पूरे उत्तर प्रदेश से — फ़ोन और WhatsApp पर
क्या यह कोचिंग है
नहीं — यह आपकी मौजूदा कोचिंग की जगह नहीं लेता

विषय

किस विषय में क्या दिक्कत आती है

मेंटर पढ़ाता नहीं है — पर प्लान इस बात पर बनता है कि हर विषय किस तरह की मेहनत माँगता है।

गणित

सबसे ज़्यादा बच्चे यहीं पीछे छूटते हैं — और वजह मुश्किल सवाल नहीं, रोज़ अभ्यास न करना होती है। टारगेट रोज़ के तय होते हैं, हफ़्ते के नहीं।

विज्ञान

तीनों हिस्से अलग-अलग रफ़्तार माँगते हैं। प्लान में भौतिकी के न्यूमेरिकल और रसायन के समीकरण अलग से शेड्यूल होते हैं।

सामाजिक विज्ञान

पढ़ने में आसान लगता है, इसलिए आख़िर के लिए टाल दिया जाता है। यही सबसे बड़ी वजह है कि नंबर यहाँ कटते हैं।

हिंदी

ज़्यादातर बच्चे इसे बिना तैयारी छोड़ देते हैं। थोड़ी सी नियमित लेखन-प्रैक्टिस से यहाँ सबसे तेज़ सुधार दिखता है।

अंग्रेज़ी

हिंदी माध्यम के बच्चों के लिए यह अक्सर सबसे डरावना पेपर है। प्लान इसे छोटे-छोटे रोज़ के हिस्सों में तोड़ता है।

साल का नक़्शा

परीक्षा की तारीख़ से पीछे की ओर बनी योजना

यह हर बच्चे का प्लान नहीं है — हर बच्चे का प्लान उसकी अपनी स्थिति पर बनता है। यह सिर्फ़ वह ढाँचा है जिसके भीतर वह बनता है।

  1. अगस्त – सितम्बर

    पूरा सिलेबस लिखकर हर चैप्टर पर निशान: मज़बूत, कच्चा, या बिल्कुल नहीं पढ़ा। जो कच्चे हैं वे पहले शेड्यूल होते हैं, क्योंकि अभी समय है।

  2. अक्टूबर – नवम्बर

    रोज़ दो-तीन छोटे टारगेट। हफ़्ते में जो छूटा, उसी हफ़्ते पकड़ा जाता है — अगले महीने नहीं।

  3. दिसम्बर

    बैकलॉग ख़त्म करने का महीना। यहीं तय होता है कि जनवरी घबराहट में जाएगा या रिवीज़न में।

  4. जनवरी

    प्री-बोर्ड और पहला पूरा रिवीज़न। जो कमज़ोर निकले, प्लान उसी हफ़्ते बदल दिया जाता है।

  5. फ़रवरी

    सिर्फ़ रिवीज़न, पिछले पेपर और आत्मविश्वास। इस महीने कुछ नया शुरू नहीं किया जाता।

आपके सवाल

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या मेंटरिंग हिंदी में होगी?

हाँ। यूपी बोर्ड के ज़्यादातर बच्चों की पूरी मेंटरिंग हिंदी में ही होती है — रोज़ के टारगेट भी और कॉल भी। अगर बच्चा अंग्रेज़ी में सहज है तो वह भी ठीक है। भाषा वही रहती है जिसमें बच्चा सोचता है।

क्या यह कोचिंग की जगह ले लेगा?

नहीं, और हम यह साफ़ कह देना ज़रूरी समझते हैं। मेंटर चैप्टर नहीं पढ़ाता। अगर बच्चे को विषय ही समझ नहीं आ रहा तो पहले पढ़ाई की ज़रूरत है, मेंटर की नहीं। यह प्रोग्राम उन बच्चों के लिए है जो समझ तो लेते हैं, पर घर आकर दोहराते नहीं।

बच्चा गाँव या छोटे कस्बे में है, क्या तब भी हो सकता है?

हाँ। सब कुछ फ़ोन और WhatsApp पर होता है, इसलिए जगह से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। एक साधारण फ़ोन काफ़ी है — न लैपटॉप चाहिए, न तेज़ इंटरनेट, न वीडियो कॉल।

शुरू करने का सही समय कब है?

जितना जल्दी हो सके, क्योंकि आदत बनने में हफ़्ते लगते हैं। सत्र की शुरुआत सबसे अच्छी है, पर अर्धवार्षिक के बाद या प्री-बोर्ड से पहले जुड़ने वाले बच्चों को भी फ़ायदा होता है — उस समय बैकलॉग और रिवीज़न की प्लानिंग सबसे ज़्यादा मायने रखती है।

बच्चा औसत है, क्या उसे फ़ायदा होगा?

औसत बच्चों को अक्सर सबसे ज़्यादा फ़ायदा होता है। टॉपर के पास पहले से अपना तरीक़ा होता है; औसत बच्चा अक्सर काबिल होता है पर उसके पास प्लान नहीं होता, बैकलॉग बढ़ता जाता है और आत्मविश्वास घटता जाता है — मेंटरशिप सीधे इन्हीं तीन चीज़ों पर काम करती है।

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